संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती को निगलती अभिव्यक्ति की आजादी

*संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती को निगलती अभिव्यक्ति की आजादी*

डॉ अजय खेमरिया

कुछ लोगों को बिना आमंत्रण के बोलने की आदत होती है वैसे हमारे मुल्क में कहा जाता है कि यहां हर आदमी को चिकित्सा शास्त्र का अपरिमित ज्ञान है आप कोई शारीरिक तकलीफ की चर्चा भर कर दीजिये ढ़ेरों उपचार आपके मस्तिष्क को भर देंगे भले ही अंत मे आपको जाना एलोपैथी के डाक्टर के पास ही पड़े।ऐसे ही लगभग हम सबको बिना जरूरत बोलने की भी आदत है ,देश के संविधान ने यूं तो मूलाधिकार के साथ कर्तव्य भी लिखकर दिए है पर 70 साल में जिस एक अधिकार के प्रति हम अभ्यस्त हुए वह अभिव्यक्ति की आजादी का ही है यानी बोलने का हक। जबसे निजी केबिल नेटवर्क खासकर खबरिया चैनलों का अवतरण हुआ है तब से अभिव्यक्ति की आजादी बिल्कुल चरम पर है सोशल मीडिया ने इसे पराकाष्ठा दे दी है हर कोई इतिहास, राजनीति,विज्ञान,धर्म,ज्योतिष, अध्यात्म, संस्क्रति,जीवन का मानो अधिष्ठाता बन गया हो,अपने सोशल मीडिया खातों को गौर से देखिये समझ आ जाएगा कि हम कितने विद्वान लोगों के बीच खड़े है आपको मानना ही होगा कि पूरी दुनिया मे ज्ञान,विज्ञान का प्रकाश हमारी ही धरती से निकला है हम कितने महान पुरखों की पुनायआई को जी रहे है।इस कड़वी हकीकत की बात करें बिना की हम न देश की चिंता करते है न हमारे समाज की न हमारी परम्पराओं ने इस संसदीय लोकतंत्र की जिसने हमे अभिव्यक्ति की आजादी दी है,कल्पना कीजिये अगर 200 साल पहले भी ये अभिव्यक्ति की आजादी होती तो क्या होता?पहले स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक की लड़ाई इसी वर्चुअल स्पेस पर लड़ी जाती और बैरिस्टर मोहन दास गांधी कभी बापू न बन पाते शायद। जरा सोचिये कितनी बड़ी बड़ी बातें होती है यहां पर ये डीन टाइप लोग घर से जब वोट डालने की बेला आती है तो कड़ी धूप या ठंडी को मतदान से ऊपर प्राथमिकता पर रखते है,इस वर्चुअल पटल ने न जाने कैसा कैसा इतिहास अपने अंदर जमा कर रखा है जो सिवाय हमे भृमित करने के कुछ भी नही करता,संस्क्रति के नाम से ऐसा विषवमन तो अंग्रेज भी नही कर पाए जो यहां हो जाता है अभिव्यक्ति की इस आजादी ने देश मे चरित्रहनन का गुर भी हम सबको स्थाई रूप से सीखा दिया जिस संसदीय लोकतंत्र में नेहरूजी अटल जी को देश का अगला प्रधानमंत्री बताकर गए जहां लाख मतभेद के बाबजूद आरएसएस के स्वयंसेवक राजपथ पर परेड में कदमताल करने के लिये आये हो जहां खुलेआम जेपी ने दिल्ही जाने वालों को ये सन्देश इंदिरा जी तक भिजवाया हो कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है उस संसदीय लोकतंत्र के खूबसूरत गुलदस्ते को आज अभिव्यक्ति की कतिपय आजादी के नाम पर हम कुचलने पर आमादा है ।यह तथ्य है कि दुनिया मे लोकतंत्र उसके नागरिकों के उत्तम चरित्र और परिपक्वता से ही आगे बढ़ सकता है आज हम 70 के दशक से ज्यादा शिक्षित है ज्यादा स्वस्थ्य है सम्पन्न है लेकिन क्या आनुपातिक रूप से जिम्मेदार भी है?हम सबको इसका जबाब खुद से लेना ही होगा।अभिव्यक्ति की आजादी की यह खतरनाक हद की व्याख्या आखिर हम किस तरफ ले जा रही है?न व्यक्ति की जन्मजात गरिमा का ख्याल,न संस्थाओं की ,न हमारे मुल्क के मानबिन्दुओ की एक तरह की अपरिमित मनमानी ने मुल्क में अजीब से हालात बना दिये है,लोग एक एजेंडा लेकर निकले है मानो ,उनका ध्येय सिर्फ चरित्रहनन।क्या खूबसूरती थी हमारी जम्हूरियत में गूंगी गुड़िया औऱ दुर्गा का अवतार एक ही मुख से सुनते थे आज न्यस्त स्वार्थ औऱ सत्ता की भूख ने सेना के शौर्य को भी लांछित करने से नही छोड़ा,जनरल को सड़क छाप गुंडा कहना औऱ भारत के टुकड़े करने की चाहत को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा जाता है ,प्रधानमंत्री हो या दूसरी संस्थाएं हम किसी को भी नही बक्श रहे है कोई किसी को किसी भी कीमत पर नही छोड़ना चाहता है ये चलन हमे कहां ले जाकर छोड़ेगा जरा कल्पना कीजिये।

Durgesh Gupta

Chief Editor

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