Upsc में जितने कलेक्टर के पद है उतने आपके पास दोस्त नही है- ब्रह्मेन्द्र गुप्ता

साथियो,कल नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में प्रवेश के लिए आयोजित राष्ट्रीय स्तर की क्लैट परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ है जिसमें जयपुर के तीन दोस्त अमन, देवांश और अनमोल ने क्रमशः तीन ऑल इंडिया रैंक पायीं।एक बार पुनः समूह में पढ़ाई का महत्व प्रतिपादित हुआ।
हिंदी में दो बहुत अच्छे शब्द हैं-प्रतियोगी और पूरक ।प्रतियोगिता के दौर में इन दोनों शब्दों का बहुत इस्तेमाल होता है लेकिन जब इनका प्रयोग गलत जगह पर होता है तो घातक परिणाम प्राप्त होते हैं।स्पष्टतः ये शब्द पर्यायवाची नहीं हैं।।
किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में लाखों छात्र बैठते हैं और यदि आप के संबंध बहुत सारे लोगों से हैं तब भी आप उनमें से हजार-पांच सौ को ही जानते होंगे।स्पष्ट है कि आपको उन योद्धाओं से लड़ना है जो कि आपकी आँखों से ओझल हैं।ऐसी स्थिति में एक तरीका है आप अकेले लड़ें और दिन रात लड़ें जबकि दूसरा तरीका है कि आप अपने अच्छे बुद्धिमान विश्वसनीय साथियों का सहयोग लें और परीक्षा में सफल हों।मुझे दूसरा तरीका प्रभावी लगता है क्योंकि इससे हम कम समय में ज्यादा विस्तृत क्षेत्र तक पहुंच पाते हैं और हमारे अध्ययन की गुणवत्ता बढ़ती है।
मित्रो,हममें से कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है।हममें से प्रत्येक व्यक्ति अनूठा और अद्वितीय है,किसी की रूचि खेल में तो किसी की इतिहास-संस्कृति में हो सकती है,किसी को विज्ञान अच्छा लगता है तो कोई साथी संविधान का ज्ञाता हो सकता है।हम अपने साथियों में अध्ययन के विषय उनकी रूचि के हिसाब से बांट लें जिससे नोट्स बनाने में सुविधा होगी,किताबें खरीदने में अपव्यय नहीं होगा और माइक्रो लेवल प्लानिंग हो सकेगी।साथ मे अध्ययन करने से समालोचना करने का अवसर मिलेगा जिसका परिणाम व्यक्तित्व विकास के रूप में दिखेगा और आपस की झिझक खत्म होगी।इस प्रकार हम साथियों के पूरक और अन्य लोगों के लिए प्रतियोगी बन सकेंगे।
अब प्रश्न उठता है कि ग्रुप में कितने साथी ठीक रहेंगे।मेरा मानना है कि चार-पांच लोगों का समूह अध्ययन के हिसाब से उपयुक्त है लेकिन उनका लेवल लगभग एक सा हो,आदतों में साम्य हो और आपस मे ईमानदारी हो।क्योंकि समूह में विश्वशनीय होना और खुलापन आवश्यक है।अक्सर हमने देखा है कि किसी प्रश्न का उत्तर न जानने वाला भी तुक्का मार देता है ऐसी स्थिति मे कांसेप्ट खराब होने की संभावना बन जाती है।यदि आपको उत्तर पता नहीं है तो सपाट तरीके से मना कर देना और मिलकर उसका हल ढूंढना ज्यादा उचित है।
जरूरी नहीं है कि ग्रुप के सभी साथी एक ही स्थान पर रहें बल्कि अलग अलग स्थानों पर रहकर भी यह कार्य कर सकते हैं लेकिन एक दो दिन के बाद एक निश्चित स्थान पर साथ बैठना आवश्यक है।जिस साथी को जो जिम्मेदारी सौंपी जाए उसे पूर्ण करने का भरसक प्रयत्न करना जरूरी है नहीं तो एक पढ़ेगा और बाकी मजे करेंगे।ऐसी दशा में आपका ग्रुप एक बोझ बन जायेगा।
मैंने स्वयं एक ग्रुप के रूप में 1996 बैच में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास की थी।ग्वालियर में आमखो पर रहने वाले ग्रुप के दो सदस्य चयनित होकर आज IAS हैं,एक आईपीएस,एक साथी एडिशनल SP,एक साथी जेलर,एक वैज्ञानिक और एक गणित के प्रोफेसर हैं।
क्लैट में इन दोस्तों की सफलता बताती है कि हम एक और एक दो नहीं बल्कि ग्यारह हो सकते हैं।याद रखें किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में अच्छे पद जितने हैं उतने दोस्त आपके पास नहीं हैं,इसलिए जब भी सफलता का प्रयास हो तो सब प्राणप्रण से प्रयास करें और सब सफल हों ऐसी कामना करें।आपस मे एक दूसरे को धोखा न दें क्योंकि धोखा देकर आप आगे नहीं बढ़ सकते। ज्ञान जितना बांटेंगे उतना बढ़ेगा इसलिए “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की संकल्पना को आगे बढ़ाएं।
निकट भविष्य में upsc सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन करने वाली है और राज्य लोक सेवा आयोग भी सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करने वाली है।अतः हम अच्छे साथी चुनें और पूर्ण ईमानदारी से एक दूसरे का साथ देते हुए सफल हों और आपके सभी दोस्त कलेक्टर,एस पी जैसे पदों पर सुशोभित हों।यह बात iit-jee,neet या दुनिया की अन्य किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा के लिए भी सत्य है।
नया दौर फ़िल्म का एक गीत “साथी हाथ बढ़ाना”जिसे मैं अक्सर गुनगुनाता हूँ प्रासंगिक है।याद रखें जितने बड़े पद किसी भी एग्जाम में सफल होने पर आपको मिलने वाले हैं उतने दोस्त आपके पास नहीं है इसलिये पूरक बनें प्रतियोगी नहीं,शुभकामनाएं।

Durgesh Gupta

Chief Editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *